वो लड़की जो हर रात लौटती थी

अध्याय 1 — पहली रात

रात के ठीक 12 बजकर 13 मिनट हुए थे।

आरव अपने कमरे की खिड़की के पास बैठा लैपटॉप पर काम कर रहा था। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी। बिजली की चमक कुछ सेकंड के लिए पूरे कमरे को सफेद कर देती और फिर सब कुछ अंधेरे में डूब जाता।

आरव पिछले तीन महीनों से शहर के किनारे बने एक पुराने मकान में रह रहा था।

मकान सस्ता था।

बहुत सस्ता।

इतना सस्ता कि जब उसने पहली बार मकान मालिक से पूछा था—

“इतना बड़ा घर इतनी कम कीमत में क्यों?”

तो बूढ़े मकान मालिक ने कुछ सेकंड तक उसे देखा था।

फिर बस इतना कहा था—

“रात में अगर कोई दरवाज़ा खटखटाए… तो खोलना मत।”

आरव हँस पड़ा था।

“चोर-वोर का डर दिखाकर किराया बढ़ाना चाहते हैं क्या?”

बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया था।

उस रात तक आरव को वह बात सिर्फ एक अंधविश्वास लगी थी।

लेकिन 12 बजकर 13 मिनट पर…

ठक… ठक… ठक…

दरवाज़े पर दस्तक हुई।

आरव का हाथ कीबोर्ड पर रुक गया।

बारिश की आवाज़ के बीच वह दस्तक बहुत साफ सुनाई दे रही थी।

ठक… ठक… ठक…

आरव ने घड़ी की तरफ देखा।

12:13 AM.

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

“इतनी रात को कौन हो सकता है?”

वह कुर्सी से उठा।

धीरे-धीरे दरवाज़े तक गया।

फिर उसे मकान मालिक की बात याद आई—

“रात में अगर कोई दरवाज़ा खटखटाए… तो खोलना मत।”

आरव ने दरवाज़े के पास लगी छोटी सी काँच की खिड़की से बाहर देखने की कोशिश की।

बाहर कोई नहीं था।

सिर्फ बारिश।

वह वापस मुड़ने ही वाला था कि—

ठक… ठक… ठक…

इस बार दस्तक उसके पीछे से आई।

आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

उसने पलटकर देखा।

दरवाज़े के ठीक बाहर एक लड़की खड़ी थी।

लगभग पच्चीस साल की।

लंबे काले बाल।

सफेद सलवार-कमीज़।

बारिश से भीगे हुए कपड़े।

और चेहरा…

बेहद खूबसूरत।

लेकिन उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जिसे देखकर आरव के शरीर में ठंड दौड़ गई।

वह लड़की सीधे उसे देख रही थी।

आरव ने दरवाज़ा थोड़ा सा खोला।

“आप… कौन?”

लड़की ने कुछ नहीं कहा।

बस धीरे से पूछा—

“क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?”

आरव कुछ समझ नहीं पाया।

“आप इतनी रात को… यहाँ?”

लड़की ने हल्की मुस्कान दी।

“मैं हर रात आती हूँ।”

आरव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

“क्या?”

लड़की ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“लेकिन आज पहली बार तुमने मुझे देखा है।”

अचानक बिजली चमकी।

एक सेकंड के लिए लड़की का चेहरा बिल्कुल साफ दिखाई दिया।

और अगले ही पल…

दरवाज़े के सामने कोई नहीं था।

आरव ने बाहर देखा।

खाली बरामदा।

बारिश।

और फर्श पर…

गीले पैरों के निशान।

वे निशान दरवाज़े से शुरू होकर सड़क की तरफ जा रहे थे।

लेकिन कुछ अजीब था।

पैरों के निशान सिर्फ बाहर जाने के थे।

अंदर आने के नहीं।


अध्याय 2 — वह हर रात आती थी

अगली सुबह आरव ने खुद को समझाया कि रात में उसने शायद कोई सपना देखा था।

उसने चाय बनाई और काम पर चला गया।

दिनभर वह उस लड़की के बारे में सोचता रहा।

उसकी आवाज़…

उसकी आँखें…

और वह अजीब वाक्य—

“मैं हर रात आती हूँ।”

शाम को घर लौटते समय आरव ने मकान मालिक को रास्ते में देख लिया।

उसने तुरंत पूछा—

“बाबा, इस घर में पहले कोई लड़की रहती थी?”

बूढ़ा अचानक रुक गया।

“क्यों पूछ रहे हो?”

“कल रात एक लड़की आई थी।”

बूढ़े का चेहरा सफेद पड़ गया।

“कैसी लड़की?”

आरव ने उसका हुलिया बताया।

लंबे बाल।

सफेद कपड़े।

लगभग पच्चीस साल।

बूढ़े ने कुछ नहीं कहा।

वह बस घर की तरफ देखने लगा।

“उसका नाम…?”

कुछ देर बाद उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

“मीरा।”

“कौन मीरा?”

बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

वह वहाँ से चला गया।

उस रात आरव ने जानबूझकर 12:13 तक जागने का फैसला किया।

12:05…

12:10…

12:12…

और फिर—

12:13।

ठक… ठक… ठक…

आरव का दिल तेज़ हो गया।

वह दरवाज़े के पास गया।

इस बार उसने दरवाज़ा नहीं खोला।

“मीरा?”

बाहर से कोई आवाज़ नहीं आई।

आरव ने फिर कहा—

“अगर तुम मीरा हो तो कुछ बोलो।”

कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

फिर एक धीमी आवाज़ आई—

“तुमने मेरा नाम याद रखा।”

आरव की सांस रुक गई।

“तुम चाहती क्या हो?”

बाहर से जवाब आया—

“बस तुमसे मिलना।”

आरव ने दरवाज़ा खोल दिया।

मीरा सामने खड़ी थी।

इस बार उसके कपड़े सूखे थे।

उसके बाल भी सूखे थे।

और उसके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी थी।

“तुम डरते नहीं हो?”

आरव ने पूछा।

मीरा मुस्कुराई।

“तुम्हें देखकर नहीं।”

“तुम हर रात यहाँ क्यों आती हो?”

मीरा ने कुछ सेकंड उसे देखा।

फिर बोली—

“क्योंकि मेरा इंतज़ार यहीं खत्म होना था।”

“किसका इंतज़ार?”

उसने जवाब नहीं दिया।

बस धीरे से कहा—

“तुम्हें याद नहीं?”

आरव ने सिर हिलाया।

“मैं तुम्हें पहली बार देख रहा हूँ।”

मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

“हाँ… इस जन्म में।”

और वह गायब हो गई।


अध्याय 3 — पुरानी तस्वीर

उस रात आरव सो नहीं पाया।

अगली सुबह उसने घर की पुरानी अलमारी खोलनी शुरू की।

उसे उम्मीद थी कि शायद उसे मीरा के बारे में कुछ पता चले।

एक पुराने बॉक्स में उसे कुछ तस्वीरें मिलीं।

ज्यादातर तस्वीरें घर की थीं।

लेकिन आखिरी तस्वीर देखकर उसका दिल रुक सा गया।

तस्वीर में एक लड़का और एक लड़की खड़े थे।

लड़की…

मीरा थी।

और लड़का…

आरव।

लेकिन यह संभव नहीं था।

तस्वीर बहुत पुरानी थी।

कम से कम बीस साल पुरानी।

आरव तस्वीर को घूरता रहा।

पीछे तारीख लिखी थी—

17 जुलाई 2006

और नीचे सिर्फ दो शब्द—

“आरव और मीरा।”

उसके हाथ कांपने लगे।

तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

“अब तुम्हें याद आने लगा?”

आरव पलटा।

मीरा कमरे में खड़ी थी।

दिन के उजाले में।

आरव पीछे हट गया।

“तुम… दिन में?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“मैं हमेशा से यहीं थी।”

आरव ने तस्वीर उसकी तरफ बढ़ाई।

“ये क्या है?”

मीरा ने तस्वीर देखी।

उसकी आँखों में आँसू भर आए।

“तुमने कहा था कि तुम मुझे कभी नहीं भूलोगे।”

आरव की सांस भारी हो गई।

“लेकिन मुझे कुछ याद नहीं।”

“क्योंकि तुम्हें याद करने नहीं दिया गया।”

“किसने?”

मीरा चुप रही।

फिर उसने खिड़की के बाहर देखा।

“उस आदमी ने।”

“कौन आदमी?”

मीरा ने धीरे से कहा—

“तुम्हारे पिता।”


अध्याय 4 — सच जो दफन कर दिया गया था

आरव के पिता की मृत्यु तब हुई थी जब वह छोटा था।

उसे अपने पिता के बारे में ज्यादा कुछ याद नहीं था।

बस इतना कि वह बहुत सख्त आदमी थे।

उस शाम आरव ने अपनी माँ को फोन किया।

“माँ, पापा के पुराने घर के बारे में आपको कुछ पता है?”

फोन के दूसरी तरफ कुछ देर खामोशी रही।

फिर माँ ने पूछा—

“तुमने वो घर क्यों खोला?”

आरव चौंक गया।

“आपको पता था?”

“वहाँ मत रहो।”

“माँ, मीरा कौन थी?”

फोन अचानक कट गया।

आरव ने दोबारा फोन किया।

कोई जवाब नहीं।

उसी रात वह पुराने घर के तहखाने में गया।

दीवार के पीछे उसे लकड़ी का एक छोटा दरवाज़ा मिला।

दरवाज़ा खोलते ही पुराने कागज़ और तस्वीरें दिखाई दीं।

एक डायरी भी थी।

उसके पिता की डायरी।

आरव ने कांपते हाथों से पहला पन्ना खोला।

एक जगह लिखा था—

“मीरा और आरव एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं।”

दूसरे पन्ने पर—

“मैं इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करूँगा।”

फिर—

“अगर आरव उससे शादी करता है तो हमारी पूरी संपत्ति चली जाएगी।”

आरव की आँखें फैल गईं।

आगे लिखा था—

“मीरा को आज आखिरी बार चेतावनी दी। उसने मना कर दिया।”

फिर कई पन्ने खाली थे।

और आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक लाइन थी—

“आज रात सब खत्म हो जाएगा।”

आरव के हाथ से डायरी गिर गई।

तभी पीछे से आवाज़ आई—

“हाँ।”

मीरा खड़ी थी।

“उस रात सब खत्म हो गया था।”


अध्याय 5 — मीरा की मौत

आरव ने पूछा—

“उस रात क्या हुआ था?”

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

“मैं तुमसे शादी करना चाहती थी।”

“और?”

“तुम भी चाहते थे।”

“फिर?”

मीरा की आवाज़ टूट गई।

“हम भागने वाले थे।”

आरव ने सांस रोक ली।

“लेकिन तुम्हारे पिता को पता चल गया।”

मीरा ने बताया कि उस रात वह पुराने रेलवे स्टेशन पर आरव का इंतज़ार कर रही थी।

आरव को वहाँ पहुँचना था।

लेकिन वह कभी नहीं पहुँचा।

मीरा घंटों इंतज़ार करती रही।

आधी रात के बाद वह घर लौटने लगी।

तभी एक कार उसके पास आकर रुकी।

कार में आरव के पिता थे।

उन्होंने उससे कहा कि आरव ने उसे छोड़ दिया है।

मीरा ने विश्वास नहीं किया।

वह कार में बैठने से मना करके सड़क पर चलने लगी।

कुछ देर बाद…

एक सुनसान सड़क पर उसकी हत्या कर दी गई।

उसकी लाश को उसी पुराने घर के पीछे जमीन में दफना दिया गया।

आरव के पिता ने सबूत मिटा दिए।

और आरव को शहर से दूर भेज दिया।

“तुम्हें सब कुछ भूलने के लिए मजबूर किया गया,” मीरा ने कहा।

आरव की आँखों में आँसू थे।

“मैं तुम्हारे लिए आया क्यों नहीं?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने तुम्हें कमरे में बंद कर दिया था।”

आरव को अचानक कुछ याद आया।

एक बंद कमरा।

खिड़की पर लोहे की सलाखें।

वह चिल्ला रहा था—

“मीरा मेरा इंतज़ार कर रही है!”

और उसके पिता बाहर खड़े थे।

फिर…

अंधेरा।


अध्याय 6 — हर रात 12:13

आरव ने पूछा—

“तुम हर रात वापस क्यों आती हो?”

मीरा ने जवाब दिया—

“क्योंकि उस रात मैं 12:13 पर मरी थी।”

कमरे में अचानक तापमान गिर गया।

“और जब तक तुम्हें सच याद नहीं आता… मेरी आत्मा यहाँ से नहीं जा सकती।”

आरव ने पूछा—

“अगर मुझे सब याद आ जाए तो?”

मीरा मुस्कुराई।

“फिर मुझे जाना होगा।”

उसकी आँखों में डर था।

जैसे वह जाने से डरती हो।

आरव समझ गया।

“तुम जाना नहीं चाहती।”

मीरा ने धीरे से कहा—

“मैंने बहुत साल इंतज़ार किया है।”

आरव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

लेकिन उसकी उंगलियाँ हवा से गुजर गईं।

मीरा पीछे हट गई।

“मुझे मत छुओ।”

“क्यों?”

“क्योंकि हर बार जब तुम मुझे छूने की कोशिश करते हो… मुझे उस रात की याद आती है।”

आरव की आँखों से आँसू निकल पड़े।

“तो मैं क्या करूँ?”

मीरा ने कहा—

“मुझे आज़ाद करो।”


अध्याय 7 — कब्र

अगली सुबह आरव ने घर के पीछे की जमीन खोदनी शुरू की।

कुछ फीट नीचे फावड़ा किसी कठोर चीज़ से टकराया।

एक पुराना लोहे का डिब्बा मिला।

और उसके अंदर…

मीरा की चूड़ियाँ।

उसका लॉकेट।

और एक पुराना कपड़ा।

आरव की आँखों में आँसू आ गए।

लेकिन उसे हड्डियाँ नहीं मिलीं।

वह और गहराई तक खोदने लगा।

तभी उसे एक पत्थर मिला।

पत्थर के नीचे एक छोटा सा गड्ढा था।

वहाँ मानव कंकाल था।

आरव घुटनों के बल बैठ गया।

उसने धीरे से कहा—

“मीरा…”

हवा अचानक तेज़ हो गई।

आसमान पर बादल छा गए।

और पीछे से वही आवाज़ आई—

“अब मुझे घर ले चलो।”

आरव ने उसकी अंतिम क्रिया करने का फैसला किया।

लेकिन तभी उसके फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

उसने फोन उठाया।

दूसरी तरफ आवाज़ थी—

“अगर तुमने यह सब बाहर बताया… तो तुम्हारी माँ भी नहीं बचेगी।”

आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

“कौन बोल रहा है?”

फोन कट गया।


अध्याय 8 — आखिरी रात

उस रात 12:13 होने में कुछ मिनट बाकी थे।

आरव ने घर के सभी दरवाज़े बंद कर दिए।

मीरा उसके सामने बैठी थी।

“तुम डर रहे हो?”

आरव ने कहा—

“हाँ।”

मीरा मुस्कुराई।

“मुझसे?”

“नहीं।”

“तो किससे?”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“उस सच से जिसे इतने सालों तक छुपाया गया।”

घड़ी ने 12:12 दिखाया।

मीरा अचानक बेचैन होने लगी।

“आरव…”

“क्या हुआ?”

“वो आ गया।”

“कौन?”

अचानक घर की लाइट बंद हो गई।

मुख्य दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

बाहर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

आरव का चाचा।

वही व्यक्ति जिसने उसके पिता की मदद की थी।

उसके हाथ में बंदूक थी।

“तुम्हें यह सब नहीं पता लगाना चाहिए था।”

आरव उसके सामने खड़ा हो गया।

“मीरा को किसने मारा था?”

बूढ़े ने हँसते हुए कहा—

“तुम्हारे पिता ने।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

“और तुमने मदद की?”

“हाँ।”

“क्यों?”

“पैसे के लिए।”

आरव की मुट्ठियाँ भींच गईं।

“और इतने सालों तक?”

“किसी ने पूछा ही नहीं।”

तभी घड़ी ने 12:13 बजाया।

टन्…

कमरे का तापमान अचानक गिर गया।

बूढ़े के चेहरे पर डर दिखाई दिया।

उसने पीछे देखा।

मीरा उसके पीछे खड़ी थी।

उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

आँखें पूरी तरह काली थीं।

“मीरा…”

वह पीछे हटने लगा।

मीरा ने कहा—

“तुमने कहा था… कोई मुझे याद नहीं करेगा।”

बूढ़ा काँपने लगा।

“मुझे माफ कर दो।”

मीरा उसके पास गई।

“मैंने बीस साल इंतज़ार किया।”

कमरे में तेज़ हवा घूमने लगी।

खिड़कियाँ टूटने लगीं।

और अचानक बूढ़ा जमीन पर गिर गया।

सब कुछ शांत हो गया।


अध्याय 9 — आखिरी विदाई

सुबह पुलिस आई।

पुरानी डायरी, कंकाल, लॉकेट और बाकी सबूत सामने आ चुके थे।

सालों पुराना सच आखिरकार सामने आ गया।

मीरा की अंतिम क्रिया उसी नदी के किनारे की गई जहाँ वह कभी आरव से मिलने जाया करती थी।

आरव ने उसकी राख पानी में प्रवाहित की।

उसकी आँखों में आँसू थे।

“अब तुम आज़ाद हो।”

पीछे से हल्की आवाज़ आई—

“आरव…”

वह पलटा।

मीरा वहाँ खड़ी थी।

इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

वह पहले से ज्यादा खूबसूरत लग रही थी।

उसने सफेद कपड़े पहने थे।

लेकिन इस बार उनमें कोई खून नहीं था।

कोई दर्द नहीं था।

सिर्फ मुस्कान थी।

आरव ने पूछा—

“क्या तुम जा रही हो?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“फिर मैं?”

“तुम्हें जीना है।”

“तुम्हारे बिना?”

मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

“हमारा प्यार खत्म नहीं हुआ, आरव।”

“बस हमारी कहानी खत्म हो गई।”

आरव उसके पास जाने लगा।

मीरा पीछे हट गई।

“इस बार मुझे जाने दो।”

आरव रुक गया।

मीरा ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा।

“और अगर कभी तुम्हें रात 12:13 पर मेरी याद आए…”

आरव ने पूछा—

“तो?”

मीरा मुस्कुराई।

“खिड़की खोल देना।”

फिर वह धीरे-धीरे हवा में घुलने लगी।

आरव चिल्लाया—

“मीरा!”

उसने आखिरी बार मुस्कुराकर कहा—

“मैं हर रात नहीं लौटूँगी… लेकिन जब भी लौटूँगी, सिर्फ तुम्हें देखने।”

और वह गायब हो गई।


अंतिम अध्याय — 12:13

एक साल बीत गया।

आरव ने वह घर छोड़ दिया।

शहर में एक नई जिंदगी शुरू की।

लेकिन उसने मीरा को कभी नहीं भुलाया।

एक रात वह अपने नए घर में बैठा किताब पढ़ रहा था।

अचानक दीवार पर लगी घड़ी रुक गई।

12:12

आरव ने घड़ी को देखा।

कुछ सेकंड बाद…

12:13।

खिड़की पर हल्की सी दस्तक हुई।

ठक… ठक… ठक…

आरव की आँखों में आँसू आ गए।

वह धीरे-धीरे खिड़की के पास गया।

खिड़की खोली।

बाहर कोई नहीं था।

सिर्फ ठंडी हवा।

लेकिन खिड़की के नीचे एक छोटा सा सफेद फूल रखा था।

वही फूल जो मीरा को पसंद था।

आरव मुस्कुराया।

उसने फूल उठाया।

और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

“तुम फिर आ गई।”

पीछे से किसी लड़की की धीमी हँसी सुनाई दी।

आरव पलटा।

कमरा खाली था।

लेकिन शीशे पर धुंध से किसी ने एक शब्द लिखा था—

“हमेशा।”

आरव की आँखें बंद हो गईं।

और पहली बार उसे डर नहीं लगा।

क्योंकि उसे पता था…

कुछ मोहब्बतें मौत से खत्म नहीं होतीं।

कुछ लोग चले जाने के बाद भी लौटते हैं।

हर रात नहीं।

हर महीने नहीं।

कभी-कभी सालों बाद।

बस यह याद दिलाने के लिए कि—

सच्चा प्यार शरीर का नहीं होता।

सच्चा प्यार इंतज़ार करता है।

और मीरा…

वह लड़की जो हर रात लौटती थी…

अब सिर्फ एक भूत नहीं थी।

वह आरव की जिंदगी की वह कहानी थी…

जिसका अंत कभी हुआ ही नहीं।

समाप्त।

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