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आख़िरी कमरा

आख़िरी कमरा

रात के करीब 2:17 बजे थे।

अमित की नींद अचानक खुल गई।

कमरे में अंधेरा था। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी और खिड़की के शीशे पर पानी की बूंदें लगातार टकरा रही थीं। बिजली कुछ देर पहले ही चली गई थी।

उसने मोबाइल उठाकर समय देखा।

2:17 AM

बैटरी सिर्फ़ 9 प्रतिशत थी।

अमित जयपुर से करीब सत्तर किलोमीटर दूर एक पुराने कस्बे में अपनी माँ का पुश्तैनी मकान बेचने आया था। माँ की मृत्यु को तीन महीने हो चुके थे। पिता पहले ही गुजर चुके थे। अब उस घर में उसका कोई अपना नहीं था।

या शायद… था।

अमित ने करवट बदली ही थी कि उसे लगा जैसे बाहर बरामदे में कोई धीरे-धीरे चल रहा है।

छप… छप… छप…

गीले पैरों की आवाज़।

वह कुछ सेकंड तक चुपचाप सुनता रहा।

आवाज़ उसके कमरे के बाहर आकर रुक गई।

फिर—

ठक… ठक…

दरवाज़े पर दो हल्की दस्तक हुई।

अमित का दिल तेजी से धड़कने लगा।

“कौन?”

कोई जवाब नहीं।

उसने दोबारा पूछा।

“कौन है?”

इस बार बाहर से एक बहुत धीमी आवाज़ आई—

“अमित…”

उसके शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

वह आवाज़ उसकी माँ की थी।

बिल्कुल वही आवाज़।

वही नरमी।

वही धीमा खिंचाव, जिससे माँ बचपन में उसे पुकारा करती थी।

“अमित… दरवाज़ा खोल बेटा।”

अमित बिस्तर से उठ गया।

उसके हाथ कांप रहे थे।

माँ को मरे हुए तीन महीने हो चुके थे।

वह दरवाज़े के पास गया, लेकिन कुंडी खोलने की हिम्मत नहीं हुई।

“माँ…?”

बाहर कुछ देर सन्नाटा रहा।

फिर आवाज़ आई—

“बहुत ठंड लग रही है बेटा… दरवाज़ा खोल दे।”

अमित की आँखों में आँसू आ गए।

उसने दरवाज़े पर हाथ रख दिया।

उसे अचानक बचपन याद आ गया।

जब वह छोटा था और रात में डरकर उठ जाता था, माँ हमेशा उसके कमरे के बाहर बैठकर कहती थी—

“डर मत, मैं यहीं हूँ।”

अमित ने धीरे से कहा,

“माँ… आप तो चली गई थीं।”

बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

कुछ सेकंड बाद—

ठक… ठक… ठक…

इस बार दस्तक ज़ोर से हुई।

“अमित, खोल!”

आवाज़ अब माँ जैसी नहीं थी।

उसमें गुस्सा था।

अमित पीछे हट गया।

तभी उसे घर की एक बात याद आई।

बचपन में माँ ने उसे हमेशा ऊपर वाले पुराने कमरे में जाने से मना किया था।

“वहाँ मत जाना।”

वह कमरा सालों से बंद था।

लेकिन शाम को जब अमित घर आया था, उसने देखा था कि उस कमरे के दरवाज़े पर लगा पुराना ताला टूटा हुआ था।

उसने सोचा था कि शायद मकान देखने आए किसी आदमी ने ताला तोड़ा होगा।

अब अचानक उसे ऊपर से आवाज़ सुनाई दी।

धड़ाम!

जैसे कोई भारी चीज़ गिर गई हो।

फिर…

एक बच्चे के रोने की आवाज़।

अमित जम गया।

“माँ…”

फिर रोने की आवाज़ आई।

धीमी।

दबी हुई।

बिल्कुल वैसी जैसे कोई बच्चा अपना मुँह हाथ से दबाकर रो रहा हो।

अमित ने मोबाइल की फ्लैशलाइट चालू की और कमरे से बाहर निकल आया।

बरामदा खाली था।

लेकिन फर्श पर पानी के छोटे-छोटे निशान थे।

गीले पैरों के निशान।

वे निशान उसके कमरे से निकलकर सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।

अमित उन्हें देखता रहा।

फिर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

ऊपर का गलियारा अंधेरे में डूबा था।

बारिश की आवाज़ वहाँ और तेज़ सुनाई दे रही थी।

आख़िरी कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।

अमित ने मोबाइल की रोशनी अंदर डाली।

कमरा बिल्कुल खाली था।

सिर्फ़ एक पुरानी लकड़ी की अलमारी, टूटी चारपाई और दीवार पर लगी एक तस्वीर।

अमित ने तस्वीर पर रोशनी डाली।

उसमें उसकी माँ थी।

और उसकी गोद में…

एक छोटा बच्चा।

अमित की साँस रुक गई।

वह बच्चा वह नहीं था।

तस्वीर में बच्चा लगभग चार साल का था।

अमित ने तस्वीर को हाथ में उठा लिया।

पीछे तारीख लिखी थी—

12 अगस्त 1998

और नीचे माँ की लिखावट में सिर्फ़ दो शब्द थे—

“मेरा रोहन।”

अमित के हाथ से तस्वीर गिर गई।

उसका बड़ा भाई रोहन था।

लेकिन घर में कभी उसका ज़िक्र नहीं हुआ था।

अमित ने हमेशा समझा था कि वह इकलौता बच्चा है।

तभी पीछे से आवाज़ आई—

“तूने उसे भुला दिया।”

अमित ने धीरे से पलटकर देखा।

दरवाज़े पर उसकी माँ खड़ी थी।

सफेद साड़ी।

भीगे हुए बाल।

चेहरा बिल्कुल वैसा ही, जैसा उसकी मृत्यु से पहले था।

लेकिन आँखें…

आँखें पूरी तरह काली थीं।

अमित पीछे हट गया।

“माँ…”

उसने हाथ बढ़ाया।

“रोहन कौन था?”

माँ कुछ नहीं बोली।

उसके चेहरे पर आँसू बह रहे थे।

फिर उसने काँपती आवाज़ में कहा—

“तू पाँच साल का था। रोहन तुझसे बड़ा था।”

अमित की आँखों से आँसू निकलने लगे।

“फिर आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि… उसकी मौत मेरी गलती थी।”

कमरे का तापमान अचानक गिर गया।

माँ ने बताया कि बरसों पहले इसी कमरे में रोहन खेल रहा था। अमित नीचे आँगन में था। माँ खाना बना रही थीं।

रोहन ने खिड़की के पास रखी कुर्सी पर चढ़कर बाहर देखने की कोशिश की।

कुर्सी फिसली।

वह नीचे गिर गया।

सिर में गंभीर चोट लगी।

माँ उसे अस्पताल ले जाने के बजाय पड़ोसियों से डर गईं।

क्योंकि उस दिन घर में पिता नहीं थे और उन्होंने रोहन को अकेले छोड़ दिया था।

कुछ ही घंटों में रोहन की मौत हो गई।

“मैं डर गई थी…” माँ रोते हुए बोलीं।

“मैंने तुझे बचाने के लिए सबको बताया कि रोहन कुछ दिनों के लिए नानी के घर गया है।”

अमित फर्श पर बैठ गया।

“और फिर?”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“फिर मैंने तुझे भी सच्चाई से दूर रखा।”

अचानक कमरे के कोने से बच्चे की आवाज़ आई—

“माँ…”

दोनों ने एक साथ उस तरफ देखा।

चारपाई के नीचे से एक छोटी-सी गेंद बाहर लुढ़ककर आई।

अमित ने काँपते हाथों से गेंद उठाई।

उस पर लाल रंग से लिखा था—

ROHAN

माँ की परछाईं धीरे-धीरे दरवाज़े की तरफ जाने लगी।

अमित चिल्लाया—

“माँ! मुझे छोड़कर मत जाना!”

माँ रुक गई।

उसने पीछे मुड़कर देखा।

पहली बार उसकी आँखों में डर नहीं था।

सिर्फ़ माँ का प्यार था।

“मैंने तुझे बहुत साल अकेला रखा…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“अब अपने भाई को अकेला मत रखना।”

अचानक बिजली आ गई।

कमरा रोशनी से भर गया।

अमित ने आँखें बंद कर लीं।

कुछ सेकंड बाद जब उसने आँखें खोलीं—

कमरा खाली था।

सिर्फ़ फर्श पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

अमित ने उसे उठाया।

तस्वीर में अब उसकी माँ और रोहन के साथ अमित भी खड़ा था।

लेकिन उसने बचपन में वह तस्वीर कभी नहीं देखी थी।

तस्वीर के पीछे एक नई लाइन लिखी थी—

“अब हम तीनों घर जा रहे हैं।”

अगली सुबह पड़ोसी ने अमित को घर के बाहर बेहोश पाया।

जब उसे होश आया, उसने सबसे पहला सवाल पूछा—

“रोहन की कब्र कहाँ है?”

पड़ोसी बूढ़ा था।

उसने अमित को कुछ देर देखा और फिर धीरे से कहा—

“तुम्हारी माँ ने कभी उसकी कब्र बनवाई ही नहीं थी।”

अमित ने उसी दिन घर के पीछे की पुरानी ज़मीन खुदवानी शुरू कर दी।

करीब चार फीट नीचे एक छोटा-सा लकड़ी का बक्सा मिला।

उसके अंदर एक बच्चे के पुराने कपड़े, एक खिलौना कार और एक छोटी-सी चिट्ठी थी।

चिट्ठी पर माँ की लिखावट थी—

“रोहन, मुझे माफ़ कर देना।”

अमित ने चिट्ठी सीने से लगा ली।

उस रात के बाद उस घर में कभी कोई आवाज़ नहीं सुनी गई।

लेकिन अमित आज भी हर साल 12 अगस्त को उस घर जाता है।

वहाँ दो अगरबत्तियाँ जलाता है।

एक अपनी माँ के लिए।

और दूसरी…

अपने उस भाई के लिए, जिसका अस्तित्व उससे पूरी जिंदगी छुपाया गया था।

कभी-कभी रात में जब बारिश होती है, अमित को लगता है जैसे घर के पुराने बरामदे में कोई बच्चा दौड़ रहा है।

छप… छप… छप…

और फिर दूर से माँ की आवाज़ आती है—

“डर मत बेटा… मैं यहीं हूँ।”

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